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इस चुनाव के बाद भविष्य में जातिवादियों की लंका लगनी क्यों तय है?

- कुमार एस- की कलम से-

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Positive India:Kumar S:
इस चुनाव ने एक और ट्रेंड को जन्म दिया है।
उसकी रेखा थोड़ी अस्पष्ट है लेकिन है अवश्य।
स्वयं को ताकतवर समझने वाली जातियों में आपस में ही सिर फुटौव्वल शुरू हो गई है।
यह स्थिति बहुत बाद में आती है, इसके मूल में राष्ट्रवाद और जातीय स्वार्थ है।
यह आंच भीतर ही भीतर सुलग रही थी अब चौराहे पर आ गई है।
इसे ज्योति मिर्धा और हनुमान बेनीवाल समर्थकों की भिड़ंत से समझा जा सकता है।

दरअसल, जातिवादी स्वार्थी तत्त्व वर्षों से समाज-समाज चिल्लाकर जातीय भावनाओं का दोहन करते थे और अपने स्वार्थ साधन करते थे।
इसमें सामान्य व्यक्ति जाति की रौ में बहने को, ठगे जाने को अपनी नियति समझ लेता था और जो #राष्ट्रवादी_समझदार लोग थे वे मन मसोसकर, सब जानते बूझते, खून का घूंट पीकर चुपचाप तमाशा देखते रहते थे।

उन्हें स्पष्ट दिख रहा था कि किस तरह चंद जातीय दम्भ से ग्रसित लोग चुपचाप पूरी जाति का बलात्कार करते रहते और इस अभिशप्त दर्दनाक प्रवृत्ति का कोई तोड़ भी नहीं था।
लेकिन इस चुनाव से पहले इस हाहाकारी पैशाचिक दुष्कर्म के विरुद्ध लोग खुलकर बोलने लगे।
जाटों का एक वर्ग जातिवाद के खिलाफ हो गया।
यादवों का एक ग्रुप भी यादववाद के विरुद्ध ताल ठोककर खड़ा है।

राजपूतों का भी एक वर्ग घृणित जातिवाद के विरुद्ध है।
यही प्रवृत्ति scst और मुसलमानों तक में शुरू हो गई है।
कुछ वर्गों में यह 10:90 है तो कई जगह 50:50 है।
और जहां बाजी पलट चुकी है, अर्थात बहुमत जातिवाद के विरुद्ध है, वहां इन्हें जमीन खिसकती नजर आती है और वे आपा खोकर गाली गलौज और घटिया हरकतों पर उतर आए हैं।

कुछ भी हो, यह तय है कि भविष्य में जातिवादियों की लंका लगनी तय है।
#कुमारsचरित
साभार: कुमार एस-(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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