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अपनी नयी पीढ़ियों को खुले शब्दों में बताइए कि हमने अपने हाथों से बाबरी मस्जिद को ढहाया है।

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Positive India:Vishal Jha:
अपनी नयी पीढ़ियों को खुले शब्दों में बताइए कि हमने अपने हाथों से बाबरी मस्जिद को ढहाया है। भौतिक रूप से उस क्रांति में भले शामिल न थे, लेकिन मानसिक रूप से अवश्य थे। पूरा हिंदू समाज था। देश के रूप में पूरा हिंदुस्तान था। इसका कारण बताइए। इस पर चर्चा कीजिए।

यदि आप शिक्षक हैं और क्लास की मर्यादा अनुमति नहीं दे रही, तो फ्रिंज क्लास कीजिए। लंच टाइम में, छुट्टी में। नई पीढ़ियों से संवाद करके ही बाबरी मस्जिद विध्वंस को मर्यादा के केंद्र में स्थापित किया जा सकेगा। अगर आप चुप रह जाएंगे, नहीं बोलेंगे, तो कोई और बोलेगा। लेकिन बोलेगा अवश्य। जो बोलेगा, जो संवाद करेगा, वह स्थापित हो जाएगा। और हमारी नई पीढ़ी एक अपराध बोध में चला जाएगी। विध्वंस और शहीद में बस एक शब्द का फर्क है।

आप विध्वंस नहीं समझाएंगे तो कोई शहीद समझा देगा। इसलिए कम्युनिकेशन गैप नहीं होना चाहिए। शब्दों का चयन बिल्कुल खुलकर कीजिए। बाबरी मस्जिद को बाबरी ढांचा कह कर बचने की कोशिश मत कीजिए। बच्चों के मस्तिष्क में एक शब्द की भी गुंजाइश बची रहेगी, तो उसी जगह पर कोई दूसरा पक्ष अपना शब्द डाल देगा। ऐसी स्थिति में बच्चे कंफ्यूज हो जाएंगे और नुकसान कर बैठेंगे।

इसलिए यह जरूरी है कि उन सभी क्रूर से क्रूर शब्दावलियों से बच्चों को स्वयं ही अवगत कराईए। उन सभी शब्दावलियों पर सहज स्वीकारभाव होना सिखाए। ताकि कोई दूसरा पक्ष उन क्रूर शब्दों के इस्तेमाल से हमारे बच्चों में कंफ्यूजन ना पैदा कर सके। शौर्य दिवस की शुभकामना।

साभार:विशाल झा

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