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कबीरा मन चंचल भया

-राजेश जैन "राही " के व्यंग्य बाण

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Positive India:Rajesh Jain “Rahi”
संत कवि कबीर दास जी ने कहा है –
*प्रेम गली अति साँकरी, जा में दो न समाय,*
*प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय*
समय तेजी से बदल रहा है। कबीर जी वाला समय अब नहीं रहा। अब तो प्रेम की गालियाँ खूब चौड़ी हैं जिसमें एक साथ कई निवास कर रहे हैं जब जिसका उपयोग हुआ उस से प्रेम कर लिया ।
अब भावुकता नहीं आवश्यकता का समय है। नए दौर में प्रेम का प्रारूप बदल गया है। विकल्प का ज़माना है। हर जगह कई विकल्प रहने चाहिए पता नहीं कब मन बदल जाए और कौन सा विकल्प काम आ जाए।
इस मामले में न प्रेमी शरीफ़ हैं, न प्रेमिकाएं पीछे।
साथ जीने-मरने की कसम कौन खाता है? सारा कुछ जॉब और पैकेज पर निर्भर है। ब्रेकअप शब्द का शुभागमन हो चुका है जिसका खूब आनंद लिया जा रहा है और तो और ब्रेकअप के बाद पुनः जुड़ने का विकल्प भी मौजूद है।
आज के युवाओं को ग़ज़ल नहीं फूहड़ कॉमेडी लुभा रही है दोहे नहीं डीजे लुभा रहा है।कबीरा के ढाई अक्षर की जगह अंकों में पैकेज देखा जा रहा है। जमाना सिंगल रोड का नहीं सिक्स लेन का है, ट्रैफिक कहीं भी न रुके, जाम की गुंजाइश ना रहे। पुराने दौर के जो बचे-खुचे लोग हैं वो कितना भी हल्ला-गुल्ला कर लें कुछ नहीं होने वाला है वो इस दौर में जीने के तरीके सीख लें इसी में उनकी भलाई है।
कबीर जी अब आप के नाम से कबीर बैंड है जहां वेस्टर्न तड़का लगाकर आपको पेश किया जा रहा है। दोहे और साखी उसमें नजर नहीं आते। डुबकी लगाने पर एक-दो दोहे मिल गए तो किस्मत की बात है, वैसे ही जैसे वन्य जीव अभ्यारण में कोई शेर नजर आ जाए।
सॉरी कबीर वर्तमान दौर में आपकी शिक्षा नहीं, आपका नाम काम का है, जो बिना रॉयल्टी के उपलब्ध है।

..राजेश जैन ‘राही’

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