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“जिसकी कमर टूट गयी हो, उसकी गर्दन कोई भी तोड़ सकता है।”-पेशवा बाजीराव

-सर्वेश कुमार तिवारी की कलम से-

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Positive India:Sarvesh Kumar Tiwari:
सन 1737 ई.! मुगल बादशाह मोहम्मद शाह के पास तब डेढ़ लाख से अधिक की सेना हुआ करती थी। मात्र तीन दशक पूर्व ही मुगल सल्तनत के सबसे प्रतापी शासक औरंगजेब की मृत्यु हुई थी। लगभग 200 वर्षों से सोने की चिड़िया भारत के बहुत बड़े भूभाग पर शासन कर रहे मुगलों के पास अब भी इतना धन था कि दुनिया वर्षों तक बैठ कर खाती।

शिवाजी महाराज की पुत्रवधू और शाहूजी महाराज की माता येशुबाई अभी कुछ वर्ष पूर्व तक मुगलों की कैद में ही रहीं थीं। कुल मिला कर बात इतनी थी मुगल सल्तनत कमजोर भले हुआ था पर अब भी उसकी शक्ति भारत में सबसे अधिक थी।

नवम्बर की संध्या! अपने किले में बैठे बादशाह मोहम्मद शाह को खबर मिली कि पेशवा बाजीराव दिल्ली पर चढ़ आया और पूरी घेराबंदी कर दी है। यह एकाएक बदहवास कर देने वाली खबर थी। लगभग पूरे देश में मुगलों के सैनिक अड्डे और गुप्तचरों का जाल बिछा था, फिर ये मराठे घुसे किधर से? किस गति से आये कि किसी को पता तक नहीं चला?

पर मुगल बादशाह इस बात पर केवल आश्चर्य कर सकता था, अविश्वास नहीं। क्योंकि उसे पता था कि वह पैंतीस वर्ष का महान योद्धा जिसका नाम बाजीराव बल्लाळ है, वह कुछ भी कर सकता है। वह हवा की तरह उड़ कर आ सकता है, और पानी की तरह सब कुछ तहस नहस कर के जा भी सकता है।

बादशाह ने पूछा, “उसके पास कितनी सेना है?” उत्तर मिला- पचास हजार से कम नहीं होगी। इतनी बड़ी सेना लेकर वह दिल्ली तक आ गया और हमें खबर तक नहीं मिली। हम उनसे क्या ही जीतेंगे।

बादशाह की हिम्मत टूट गई। फिर भी, वह बादशाह था। स्वयं युद्ध में जाना उसके खानदान की परम्परा नहीं थी! सो उसने सेनापति को आदेश दिया- हमला करो! खदेड़ दो इन मराठों को…बादशाह जानता था कि उसे पकड़ना या कैद करना तो बिल्कुल ही असम्भव है।

सेनापति मीर हसन खां कोका निकले। अपनी पूरी सेना के साथ। पर वे मराठे थे। वह बाजीराव था। ताम्बे सी वलिष्ठ भुजाएं… हवा से बात करने वाली तलवारें… हर हर महादेव के नारे के साथ हर पर्वत को लांघ जाने के साहस वाला कलेजा… न मुगल सैन्य वापस किले में जा सकी, न हसन खान कोका दुबारा कहीं दिखाई पड़े…

बादशाह मोहम्मद शाह तहखाने में छिप गए। मुगल सेना जहाँ थी, वहीं थम सी गयी। देश जान गया था कि पेशवा बाजीराव दिल्ली घेर कर बैठे हैं, पर कुछ कोस की दूरी पर ही आगरे में बैठी विशाल मुगल सेना दिल्ली की ओर झांकने भी नहीं आयी। मौत से सबको डर लगता है भाई!

किसी ने पूछा पेशवा से, “अब?” उसने मुस्कुरा कर कहा- दिल्ली देखने आये थे, सो देख लिया। इसे तो जब चाहें तब जीत लेंगे। चलो वापस, दिल्ली की कमर टूट गयी है। जिसकी कमर टूट गयी हो, उसकी गर्दन कोई भी तोड़ सकता है।”

ठीक दो साल बाद। बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला अपने ही दरबार में पैरों में घुंघरू बांध कर नाच रहा था, और उसकी गद्दी पर बैठा आक्रांता नादिरशाह उसके ऊपर गिन्नियां फेंक फेंक कर ठहाके लगा रहा था। जैसे समय पेशवा की हाँ में हाँ मिला कर कह रहा हो, “जिसकी कमर टूट जाय, उसकी गर्दन कोई भी तोड़ सकता है।”

साभार -सर्वेश तिवारी श्रीमुख-(ये लेखक के अपने विचार हैं)
गोपालगंज, बिहार।

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