

Positive India: Dr.Sanjay Shrivastava:
अब हमारी दोस्ती बहुत गहरी होती जा रही थी…
एक दिन मैं जब अपने हॉस्पिटल से लौट कर आया तो खाना खाकर आशीष के घर पहुंच गया..दरवाजा खटखटाया.. एक बुजुर्ग महिला ने दरवाजा खोला.. मैं थोड़ा ठिठक गया..पूछा “आशीष है क्या “?..वो मुस्कुरा कर बोलीं “तुम डॉ संजय हो ना”?..मैंने कहा “हां”..”आप”?….”मैं आशीष की मम्मी हूं बेटा”वो बोलीं..”आओ अंदर आ जाओ”..आशीष है अंदर,नहा रहा है”…मैं सकुचाते हुए भीतर कुर्सी पर जा बैठा..
वो हंसने लगीं “अरे बेटा!वहां बैठो दीवान पर आराम से..मैं जानती हूं तुम आशीष के बहुत अच्छे दोस्त हो”…
तभी आशीष आ गया..”आई!उसने कहा “ये ही हैं डॉ साब!”
मैं बोला”चलता हूँ भाई!बाद में मिलता हूँ!”
“अरे”…ऐसे कैसे?”मां बोलीं..”खाना तो खाना ही पड़ेगा”…मैं बोला”खाना तो खा लिया मैंने”…”तो फिर लस्सी पीकर जाओ”…और अंदर चली गईं…लस्सी पीकर मैं आ गया..
मां बहुत दिनों तक रुकी थीं..इस बीच मैं भी उनको अम्मा कहकर बुलाने लगा था..बहुत ही प्यारी और गरिमापूर्ण महिला थीं..मुझे अपना बड़ा बेटा कहती थीं..
उनका मैंने फिर इलाज भी किया और उनको फायदा भी हुआ था…
क्रमशः…