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बालाजी मंदिर में भक्तों को गाय की चर्बी वाला प्रसाद खिला रहे थे

-सर्वेश कुमार तिवारी की कलम से-

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Positive India: Sarvesh Kumar Tiwari:
मन्दिर की व्यवस्था यदि धर्मनिरपेक्ष सत्ता के अधिकार में हो, तो वह धर्म केंद्रित होने की जगह बाजार केंद्रित हो जायेगी। तिरुपति बालाजी मंदिर के साथ साथ देश से सभी मंदिरों में यही हुआ है।

हमें उस रिपोर्ट पर आश्चर्य हो सकता है जो कहती है कि बालाजी मंदिर के प्रसाद में प्रयुक्त घी अशुद्ध था, चर्बी और मछली का तेल वाला था। पर देश के अन्य सरकारी मंदिरों में बनने वाले प्रसाद की जांच करा लीजिये, रिपोर्ट वही मिलेगा जो बालाजी मंदिर के प्रसाद का आया है। बात बहुत सहज है। मन्दिर प्रशासन का बोर्ड प्रसाद सामग्री के लिए टेंडर जारी करता होगा। ठेकेदार घी खरीदते समय शुद्धता से अधिक महंगे-सस्ते का ध्यान रखेगा, क्योंकि उसका लक्ष्य धनलाभ है, धर्मलाभ नहीं। और सस्ते घी का अर्थ क्या होता है, यह कौन नहीं जानता?

तिरुपति मन्दिर संसार में सर्वाधिक दानराशि पाने वाला मन्दिर है। स्थाई सम्पत्ति को छोड़ दीजिये, तब भी पाँच हजार करोड़ प्रतिवर्ष की आय है। इसमें छह सौ करोड़ रुपये मुनाफा तो केवल उस प्रसाद की बिक्री से होता है जो चर्बी वाले घी से बन रहा था। अगर रिपोर्ट सही है तो इसका सीधा मतलब है बोर्ड में बैठे लोग मुनाफा कमाने के लिए भक्तों को चर्बी वाला प्रसाद खिला रहे थे। कितना घिनौना है न यह? क्या आपको नहीं लगता कि तब बोर्ड में बैठे लोग धर्म नहीं धंधा कर रहे थे।
क्या मन्दिर में प्रसाद की शुद्धता का ध्यान नहीं रखा जा सकता? क्या प्रसाद के लिए आवश्यकता भर का शुद्ध घी उपलब्ध नहीं हो सकता? बिल्कुल हो सकता है, बल्कि सहजता से हो सकता है। बोर्ड में बैठे लोग चाहें तो बिल्कुल हो सकता है। पाँच हजार करोड़ का दान पाने वाला ट्रस्ट क्या नहीं कर सकता? पर यह तब होगा जब संचालन धर्मनिष्ठ लोगों के हाथ में हो।

मन्दिर और गुरुकुल की प्राचीन व्यवस्था में गौशाला आवश्यक अंग होती थी। आवश्यकता भर का दूध घी उसी गौशाले से प्राप्त किया जाता था। पर सरकारी कमिटी ऐसी व्यवस्था नहीं बनाएगी। वहाँ बैठे लोग कमीशन के लिए बाजार से घटिया सामग्री ही खरीदेंगे और भक्तों को चर्बी वाला प्रसाद ही खाना होगा।

मैंने सर्च किया तो पाया, बालाजी मंदिर के पास अपनी ढाई हजार एकड़ कृषि भूमि है। मन्दिर प्रशासन चाहे तो बेसन से लेकर घी और गुड़ तक उसका अपना होगा। इसमें हजारों परिवारों को रोजगार मिलेगा, वह अलग है। पर ऐसा होगा नहीं! वे करेंगे ही क्यों?

मन्दिर हिन्दुओं का है, पर बोर्ड में अन्य धर्मावलंबी भी रहते हैं। वैसे लोग, जिनकी धर्म में आस्था तक नहीं है। क्यों भाई? यह अत्याचार क्यों? यह तो सीधे सीधे गुलामी है। फिर यही न होगा?

जबतक मंदिरों पर से सरकारी नियंत्रण समाप्त नहीं होता, यही होता रहेगा। बालाजी मंदिर के प्रसाद की रिपोर्ट यदि गलत भी निकल जाय, तब भी देश के अनेक सरकारी मंदिरों का सत्य यही होगा। बाजारु घी से बने प्रसाद में शुद्धता की गारंटी है क्या?

कम से कम मेरा स्पष्ट मत है कि मन्दिर संतों के हाथ में होना चाहिये। जबतक यह नहीं होता, कुछ बदलने वाला नहीं।

साभार:सर्वेश तिवारी-(ये लेखक के अपने विचार हैं)
गोपालगंज, बिहार।

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