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भारत में मुसलमानों के पक्ष में बैटिंग करने के लिए कोई न कोई हिन्दू ही उनके लिए घोड़ी बन जाता है

-कुमार एस की कलम से-

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Positive India: Kumar S:
1947 के बड़े नरसंहार से बचने के लिए कांग्रेस झुकती चली गई। पाकिस्तान देना ही पड़ा। ऊपर से भले ही यह लगता है कि विभाजन केवल गाँधी नेहरू की साजिश थी लेकिन सच्चाई यह है कि पूरा का पूरा केंद्रीय नेतृत्व मन ही मन यही चाहता था। मुस्लिम गुंडागर्दी से सभी डरते थे और कलकत्ता से लेकर लाहौर तक गलियों में छुरे लेकर दौड़ते मुस्लिम गुण्डे जिस किसी हिन्दू को जानवरों की तरह जिबह कर रहे थे। इस पशुता का कोई हल नहीं था। स्वयं हिन्दू प्रतिकार करना नहीं चाहता था और कांग्रेस उसकी रक्षा करना नहीं चाहती थी, तो दोनों ही काम हो गए। पाकिस्तान भी बन गया और दंगे, जो कि #हिन्दूनरसंहार था, वह भी नहीं रुका।
मुस्लिम में यह ट्रिक मुहम्मद के समय से ही अपनाई जाती रही है, अपनी अग्रिम हरकतों से ऐसा माहौल बना दो कि सामने वाले को लगे यह न तो समझौता करेगा, न पीछे हटेगा और विभिन्न क्रूर कर्म से ऐसा संकेत दे दो कि उसकी तरंगों से शत्रु भीतर तक काम्प जाए और युद्ध की नौबत ही न आये। मक्षिका विजय में यही ट्रिक अपनाई गई थी। पाकिस्तान बनने में भी। जो लूटमार थी वह तो बोनस था।
तत्कालीन भारत में एक व्यक्ति इस कार्य को रोक सकता था “सरदार पटेल” लेकिन उसे रियासतों वाले अभियान में व्यस्त रखा गया।

अस्तु, यह भारत का दुर्भाग्य है कि मुसलमानों के पक्ष में बैटिंग करने के लिए मुसलमानों को आने की जरूरत ही नहीं पड़ती, कोई न कोई हिन्दू ही उनके लिए घोड़ी बन जाता है और यह सब #उन_अदृश्य_तरंगों का कमाल है।
निर्णायक क्षणों में अच्छे अच्छों की फट जाती है, कोई कोई धीर वीर ज्ञानी ही वहां टिक पाता है।
समय का चक्र घूमा है, 1947 की स्थिति पुनः उत्पन्न हो रही है, भूमिकाओं और संज्ञाओं में बदलाव आया है, चीजें वही दुहराई जा रही है।

एक एक कर सबकी परतें खुलती जा रही है।
एक बार मोहनराव जी भागवत ने जो कहा था उसका भाव कुछ यह था “संघ कुछ कर रहा है लेकिन वह परफेक्ट कर रहा है ऐसा नहीं कह सकते। फिलहाल यह करते हुए संघ दिख रहा है, जिस दिन संघ से भी अच्छा विकल्प मिलेगा मै पहला व्यक्ति होऊंगा जो संघ छोड़कर वहां जाऊंगा!”
पूज्य सुदर्शन जी ने एक प्रश्नोत्तरी में कहा था “जिस लक्ष्य को पूरा करने चले हैं, संघ उसमें सहायक होगा। मुख्य भूमिका में संघ नहीं कोई और होगा। हो सकता है इसका यश कोई और ले जाये, कोई भी ले जाये पर लक्ष्य सिद्धि हो रही है हमारे लिए यही पर्याप्त है!”

वह #कोई_और कौन है? कल्कि अवतार सम्भल में होने का क्या अभिप्राय है?
क्या योगी आदित्यनाथ या बागेश्वर बाबा या फिर कोई और की एंट्री होने जा रही है?
संघ का अपने ही प्रति अश्रद्धा निर्माण के वक्तव्य, अनेक कार्यकर्ताओं का उदासीन होकर घर बैठ जाना और बहुत सारे प्रचारकों का घर लौट जाना या लौटने के द्वंद्व में जीना, आपको क्या लगता है?

बड़े कथानकों का क्लाइमेक्स अत्यंत जटिल, गतिशील और भ्रमित कर देने वाले घटनाक्रमों से सुसज्जित होता है।
हिन्दुओं के लिए मेरा यह संदेश है, आज पहली बार कह रहा हूँ- “धीरज रखिये सब ठीक होगा!” इस वाक्य से मै असहमत हूँ।
सब ठीक नहीं होगा। ठीक है भी नहीं। तैयारी रखिये।

साभार:कुमार एस-(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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