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राष्ट्रीय प्रेस दिवस तथा पत्रकारिता का विश्लेषण

-संदीप तिवारी राज की कलम से-

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Positive India:Sandeep Tiwari Raj:
भारत एक लोकतंत्र देश है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ‘पत्रकारिता’ को माना जाता है, क्योंकि यहां लोगों को अभिव्यक्ति की आजादी है। भारत में प्रेस की स्वतंत्रता भारतीय संविधान के अनुच्छेद-19 में भारतीयों को दिए गए ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ (Right to Expression) के मूल अधिकार से सुनिश्चित होती है।

प्रथम प्रेस आयोग ने भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा एवं पत्रकारिता में उच्च आदर्श कायम करने के उद्देश्य से एक ‘प्रेस परिषद’ (Press Council) की कल्पना की थी। परिणाम स्वरूप 4 जुलाई 1966 को भारत में Press Council की स्थापना की गई, जिसने 16 नंवबर 1966 से अपना विधिवत कार्य शुरू किया। तब से लेकर आज तक हर साल 16 नवंबर को ‘राष्ट्रीय प्रेस दिवस’ (National Press Day) के रूप में मनाया जाता है।

तथ्यपरकता, यथार्थवादिता, संतुलन एवं वस्तुनिष्ठता इसके आधारभूत तत्व है। परंतु इनकी कमियां आज पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत बड़ी त्रासदी साबित होने लगी है। पत्रकार चाहे प्रशिक्षित हो या गैर प्रशिक्षित, यह सबको पता है कि पत्रकारिता में तथ्यपरकता होनी चाहिए। परंतु तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर, बढ़ा-चढ़ा कर या घटाकर सनसनी बनाने की प्रवृति आज बढ़ रही है।
खबरों में पक्षधरता एवं अंसतुलन भी प्रायः देखने को मिलता है। इस प्रकार खबरों में निहित स्वार्थ साफ झलकने लग जाता है। आज समाचारों में विचार को मिश्रित किया जा रहा है। समाचारों का संपादकीयकरण होने लगा है। विचारों पर आधारित समाचारों की संख्या बढऩे लगी है। इससे पत्रकारिता में एक अस्वास्थ्यकर प्रवृति विकसित होने लगी है। समाचार विचारों की जननी होती है। इसलिए समाचारों पर आधारित विचार तो स्वागत योग्य हो सकते हैं, परंतु विचारों पर आधारित समाचार अभिशाप की तरह है। ऐसी पत्रकारिता को पीत पत्रकारिता कहते हैं जिसमें सही समाचारों की उपेक्षा करके सनसनी फैलाने वाले समाचार या ध्यान-खींचने वाले शीर्षकों का बहुतायत में प्रयोग किया जाता है। इसे समाचारपत्रों की बिक्री बढ़ाने का घटिया तरीका माना जाता है…!!!

साभार: संदीप तिवारी राज-(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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