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अधरा न धरौंगी…

- सर्वेश कुमार तिवारी की कलम से-

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Positive India:Sarvesh Kumar Tiwari:
फरीद लिखते हैं, “रे कौवे! मेरा सब तन खा ले, बस आंख छोड़ दियो! कौन जाने उस निर्जीव आंख के भाग्य में ही पिया को देख लेना बदा हो! एक बार, बस एक बार किसी को देख भर लेने की बेचैनी की कल्पना कर सकेंगे? कर सकें तो कर के देखिये, वही प्रेम है।
कभी बनारस वाली सुन्दर वेश्या के गीत सुनिये! अपने प्रिय को देश निकाला दे दिए जाने के बाद जीवन भर वियोग के गीत गाती रही ‘सुन्दर’ जब गाते गाते मुस्कुरा उठती, तो लोग दीवाने हो जाते। पर शायद ही कोई समझता होगा उस मुस्कान की पीड़ा… प्रेम जब पूरी सात्विकता के साथ उतर जाय तो व्यक्ति वियोग में मुस्कुरा उठता है, और संयोग के क्षणों में रोने भी लगता है। भावनाओं का प्रगटीकरण बिल्कुल ही विपरीत क्रिया के साथ होने लगे, तो समझिये कि मन में केवल और केवल प्रेम ही है।
एक थे घनानन्द! वही, सुजान के घनानन्द! अब सुजान कौन? तो वही, जो घनानन्द की न हो सकी। जीवन भर प्रिय के नाम गीत लिखते रहे उस सरल हृदय कवि की छाती में भी आतंकी अहमद शाह अब्दाली के किसी सैनिक ने कटार उतार दिया, तो कवि ने अपने कलेजे के खून से लिखी अंतिम कविता! “अधर लगे हैं आनि करि कै पयान प्रान, चाहत चलन ये संदेसों लै सुजान को!” जीवन भर तुम्हारे सन्देश को तड़पता रहा सुजान, काश कि प्राण निकलते निकलते ही तुम्हारा कोई सन्देश मिल जाता…” कर सकें तो कर के देखिये उस तड़प का अनुभव! वही प्रेम है…
एक रसों की खान भी थे जो किसी गोपी से कहलवा गए कि “वा मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी…” कन्हैया के अधरों से हमेशा सटी रहने वाली यह सौतन मुरली! कुछ भी हो जाय, इसे अपने होठों से तो न लगाउंगी… इस घृणा, इस तिरस्कार और इस जलन को समझ सकें तो समझ लीजिये, यह भी खालिस प्रेम ही है।
अच्छा यह सब छोड़िये! मानस के पुष्पवाटिका प्रसङ्ग में आइये। राजकुमार राम के दर्शन के बाद भागी भागी पूजन को गयीं राजकुमारी जानकी की माँ गौरी से प्रार्थना… मन अनुरूप सुभग वर मांगा। यह याद रखते हुए कि कवि बाबा तुलसी ने अपने माता-पिता का प्रेम लिखा है, ढूंढ सकें तो सिया की याचना में ढूंढिये प्रेम! इस संसार में उससे अधिक पवित्र कुछ भी नहीं।
बचपन में तिरहुतिया नाच पार्टी वालों का एक नाटक देखते थे- रानी सारंगा- सदाब्रिज की कथा। नायक नायिका मिलते हैं, प्रेम होता है और बिछड़ जाते हैं। फिर एक दूसरे से मिलने के लिए बार बार जन्म लेते हैं। जाने कितने जन्म… पुनर्जन्म किसने देखा है भाईसाहब, पर यदि होता हो तो मृत्यु के बाद दूसरे जन्म तक व्यक्ति अपने साथ सिर्फ एक ही भाव लेकर जा सकता है, केवल और केवल अपना प्रेम… शेष को यहीं जल जाना होता है।
तो सुनो दोस्त! यह प्रेम तुम्हे जिस रुप में भी मिला हो, उसे बसाए रखना अपने भीतर… साथ में केवल यही जाएगा। और हाँ, हम भी… खैर छोड़ो!

साभार:सर्वेश तिवारी श्रीमुख-(ये लेखक के अपने विचार है)

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